Sunday, May 25, 2014
Saturday, September 24, 2011
Friday, September 23, 2011
Sunday, September 11, 2011
Saturday, September 10, 2011
Monday, September 5, 2011
सलोन के मुस्लिम गहरवार (21)


यह कीमती दस्तावेज़ गालिबन इस्तेमरारी बन्दों बस्त लागू होने के बाद के हैं. इसमें गहरवार ज़मींदारों के नाम और ज़मीन का रकबा दर्ज है. उस वक़्त ज़मीन की कोई ख़ास क़ीमत न थी, न ही
ज़मीन गुज़ारे के लिए काफ़ी हुवा करती थी. इन ज़मीनों के बल बूते कोई बशर अपने परिवार का गुज़ारा नहीं
कर सकता था. खेतियाँ मेहनत कश अफ़राद ही बचा सकते थे जो ज़मीन दारी के मालिक ज़मीन दारों के बस की बात नहीं रह गई थी.
सलोन से गहरवारों का बकसरत हिजरत परदेसों को इन्हीं वक्तों में हुवा. ग़रज़ ज़राअतें हाथों से निकलती गईं.
यह बेश बहा दस्तावेज़ मुझे शराफत उल्लाह (वल्द लाल मियाँ) से हासिल हुए जिनके दादा
मेड़ई खान परदेस में रहते थे और भारी भरकम जमीन दारी नस्लों के हाथों से जाती रही.
मैं भाई शराफत उल्लाह का शुक्र गुज़र हूँ कि उन्हों ने अपने बुजुगों की अमानत दारी की जो मेरे काम आई.
सलोन के मुस्लिम गहरवार (20)
शजरे का शजर अपनी जड़ों को संभाले हुए तकरीबन ऊपर की शाखों तक पहुँच गया है, इसमें अभी तक लगभग ७०० नाम दर्ज हो चुके हैं और कहीं कहीं पुश्ते बीसवीं पायदान को छूती हैं. हालाँकि मेरा अंदाज़ा है कि मूरिसे आला की नस्लों का ये चौथाई हिस्सा है. जो लोग इस में शामिल नहीं किए जा सकते वह मुस्तनद नहीं है कि उनकी नस्ली कड़ियों का मीलन नहीं हो पाया. कुछ लोग सोचते होंगे कि इन गड़े हुए मुर्दों की कब्रें खोलने का क्या फ़ायदा?
मैं उनको मुतमईन तो नहीं कर सकता, हाँ! इतना ज़रूर कहूँगा कि तवारीख ए इंसानी इन्हीं गड़े हुए मुर्दों में छिपी हुई है, जब हमारा समाज पूरी तरह से इंसानियत का दामन थाम लेगा और सिर्फ इंसान के आलावा कोई हिन्दू मुस्लिम वगैरा नहीं बचेंगे तब यह इंसानी पहचान बे मानी हो जाएगी.
मेरे इस मुहिम का मक़सद है, जैसे किसी शजर के फल फूल और पत्तियाँ एक दूसरे के पोषक रहते हैं, वैसे ही गहर वर और खास कर मुस्लिम गहरवार (जो निस्बतन बहुत पामाल हो चुके हैं) एक दूसरे के यार व मदद गर हो जाएँ.अपने फल फूल को नुक़सान पहुँचाना कोई अच्छा काम नहीं है.
किसी को नुक्सान पहुँचाए बगैर एक दूसरे का फ़ायदा सोचें.
सलोन के मुस्लिम गहरवार (19)
अजीजो !भूल कर भी किसी से न कहना कि तुम राजा मियाँ, काशी नरेश राजा देव दत्त की नस्लों में से हो. कहना हो तो सिर्फ खुद से कहना, अपने गरीबान में मुँह डाल कर झाँकना कि तुम आज हक़ीक़त की ज़मीन पर क्या हो कहाँ हो ? तुम्हारी पामाली तुम्हारे लड़ाका बुजुर्गों का नतीजा है,जो अनजाने में नफ़रत के शिकार रहे और तुम्हें बद तरीन हालत में लाकर खड़ा कर दिया है.
ख़बरदार ! उनको बुरा भला भी मत कहना कि वह नादान थे. अब तुमको समझदार बन्ने की ज़रुरत है.
अपने अन्दर एहसास पैदा करो कि तुम्हारे अन्दर खून की धार उनकी है जो हुक्मरान हिंद हुवा करते थे. खुदा न करे कि तुम हुक्मरानी के कोई जुज़ बनो, मगर बेहतर इन्सान बनना तुम्हारे अख्तियार में है. तुम सच्चे और ईमानदार इंसान बनो, अपने और अपने बच्चों के हलक़ में बे ईमानी का एक लुकमा भी मत जाने दो. अपने बच्चों को भरपूर तालीम दो, भले ही तुम को आधा पेट भूका रहना पड़े. तालीम ही तरक्की की सीढ़ी है.
अहद करो कि तुम अपने भाई बंद के हर मुमकिन मदद गार रहोगे,
दिलों का निफ़ाक़ ख़त्म करके एक दूसरे के मदद गार हो जाओगे,
मगर इस फेल से किसी तीसरे का सीधा नुकसान न हो.
एकता कायम करो, एकता में बड़ी बरकत है, साथ साथ नेकता का भी ख़याल रहे कि नेक इंसान ही अच्छे काम कर सकता है.
सलोन के मुस्लिम गहरवार (18)

आईने का सच
*क़ानून ए फ़ितरत पर यक़ीन रखना, है सच्चा ईमान है.
*बे खौफ होकर वजूद की गहराइयों में डूबें, अपने आप से सवाल करें कि आप क्या हैं?
* जो जवाब मिलें वही आप हैं.
*आपकी विरासत ने आप को जाने क्या क्या बना रक्खा है,
*माहौल के कठ मुल्लाओं ने आपको गुमराह कर रखा है.
*हम जुग्राफियाई एतबार से अपनी ज़मीन की रचना हैं,
*ऐतिहासिक सांचों ने हमारे पैकर को गलत ढाल दिया है.
*हजारो इलाकाई और तबक़ाती खुदा वहदानियत की तलवार से अगर झूठे साबित हो चुके है,
*तो अभी यह साबित होना बाकी है की खुदा वाहिद है,
*खुदा है भी या नहीं?
*हम सिर्फ एक इंसान हैं, हमारे धर्म की खुशबू इंसानियत होनी चाहिए.
* जब इंसानियत का फूल पूरी तरह से खिल उठेगा तो ज़मीन पर फैली तमाम ग़लाज़तें अपने आप काफ़ूर हो जाएंगी.
* मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना - - - सबसे बड़ा झूट है.
जुनैद 'मुंकिर'
सलोन के मुस्लिम गहरवार (17)
मुस्लिम गहरवारों के नाम
ख़ुद को कहते हो गुलामाने-रसूले-अरबी1,
हैसियत दूसरे दर्जे के लिए हैं अजमी2,
तीसरा दर्जा हरब, ३रखता है 'मुंकिर', हरबी.
और फ़िर दर्जा-ऐ-जिल्लत4 पे हैं हिन्दी मिस्कीं5,
बरतरी६ को लिए मगरूर हैं काबा के अमीं७,
सोच है कैसी तुम्हारी ? भला कैसा है यकीं ?
हज से लौटे हुए हाजी से हकीक़त८ पूछो,
एक हस्सास९ से कुछ करबे-हिकारत पूछो।
है वतन जो भी तुम्हारा, है तुम्हें उसकी क़सम,
खून में पुरखो की धारा है? तुम्हें उसकी क़सम,
नुत्फे१० की आन गवारा है? तुम्हें उसकी,
जेहन का कोई इशारा है ? तुम्हें उसकी क़सम,
अपने पुरखों की खता क्या थी भला हिदू थे ?
क़बले इस्लाम सभी हस्बे खुदा हिन्दू थे।
जेब११ देता ही नहीं पुरखो की अजमत१२ भूलो,
उनको कुफ्फर१३ कहो और ये बुरी गाली दो।
खून में पुरखो की धारा है? तुम्हें उसकी क़सम,
नुत्फे१० की आन गवारा है? तुम्हें उसकी,
जेहन का कोई इशारा है ? तुम्हें उसकी क़सम,
अपने पुरखों की खता क्या थी भला हिदू थे ?
क़बले इस्लाम सभी हस्बे खुदा हिन्दू थे।
जेब११ देता ही नहीं पुरखो की अजमत१२ भूलो,
उनको कुफ्फर१३ कहो और ये बुरी गाली दो।
क़ौमे होती हैं नसब14 की कोई बुनियाद लिए,
अपने मीरास१५ से पाई हुई कुछ याद लिए,
तुम बहुत खुश हो बुरे माजी१६ की बेदाद१७ लिए,
अरबों की जेहनी गुलामी18 की ये तादाद लिए।
अपने मीरास१५ से पाई हुई कुछ याद लिए,
तुम बहुत खुश हो बुरे माजी१६ की बेदाद१७ लिए,
अरबों की जेहनी गुलामी18 की ये तादाद लिए।
अपने खूनाब19 की, नुत्फे की तहारत20 समझो,
जाग जाओ नई उम्मत21 की जरूरत समझो।
जाग जाओ नई उम्मत21 की जरूरत समझो।
अज सरे नव22 नया एहसास जगाना होगा,
इक नए बज्म२३ का मैदान सजाना होगा।
इक नई फ़िक्र24 का तूफ़ान उठाना होगा,
मादरे हिंद में ही काबा बनाना होगा।
राम और श्याम से भी हाथ मिलाना होगा,
नानको-बुद्ध को सम्मान में लाना होगा,
दूर तक माज़िए नाकाम25 में जाना होगा,
इस ज़मी का बड़ा इन्सान बनाना होगा।
************************************************
सलोन के मुस्लिम गहरवार (16)
इन्हीं मफ्कूदुल खबर में मैंने अपना नाम देना पसंद किया है. आज हूँ ,कल न होऊंगा, जैसे यह हमारे बुजर्ग कल थे, आज नहीं हैं.
गुल की मानिंद पी है हमने जहाँ में जिंदगी,
रंग बन कर आए हैं, बू बन के उड़ जाएँगे हम.
बड़ा ही करब नाक मेरा बचपन था. एक वक़्त की रोटी के बाद दूसरे वक़्त का ठिकाना न रहता. एक ही कपडे को बरसों लादे रहता. इन हालात में खेतों और बागात की चोरी भी मुझे करनी पड़ती. दस साल तक किसी स्कूल का मुंह नहीं देखा, मेरे रिश्ते के मामा ने मज़्कूरह " जूनियर हाई स्कूल सलोन'' खोला और पांचवीं दर्जा पास बच्चों की एक क्लास बनाई, मोहल्ले के लाखैरे बच्चों को बाहर वरांडे में बिठा कर स्कूल का वज़न बढाया, उन्हीं लाखैरे बच्चों में एक मैं भी था जिसने किसी तरह से छटवां दर्जा पास करते हुए नवीं दर्जे में सर्वोसय विद्या पीठ इंटर कालेज सलोन में प्रथम स्थान हासिल किया.
सिर्फ छः सालों में हाई स्कूल पास करने के बाद फिर हौसला जवाब दे गया. आधे पेट के खाने और भर पेट बड़ों की मार और गलियाँ अब और गवारा न हुवा .
१९६० में सलोन से बाहर निकल कर, तबा आज़माई की, छः साल खना बदोशी में कटे, फिर मौक़ा मिला, मुझे अपनी सब से बड़ी दुश्मन गरीबी को मात देने का.गरीबी से नजात मिली तो दौलत की भूक भी जाती रही. इस बीच जितना मुमकिन था अपनों को सहारा देता रहा और उन्हीं से मात खता रहा.
पुवर फंड लेकर पढने वाला बच्चा लाखों रुपिये इनकम टेक्स भर चुका है. मैं मुतमईन हूँ कि धरती पर आकर धरती का हक अदा कर रहा हूँ.
मेरी चार लायक़ औलादें हैं, यही मेरी जमा पूँजी है.
बड़ी बेटी डाक्टर आसिया चौधरी अली गढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरार है.
दूसरी बेटी फराह खान कर्नल अशरफ़ खान की बीवी है और अपनी तालीमी बरकतों का फायदा उठा रही है,
बड़ा बेटा फैजी चौधरी तालीम की सीढ़ियाँ चढ़ता हुवा लन्दन पहुंचा और U K की नेशनलटी हासिल की.
चौथा बेटा मंज़र चौधरी सोफ्ट वियर इंजीनियर बन कर फ़िलहाल बंग्लोरू में कयाम पजीर है.
मैंने बचपन से ही मेहनत और मशक्क़त का सामना किया, जवानी में सोलह घंटे रोज़ाना काम किया, अब ज़ईफ़ी और बीमारी ज़िन्दगी में हाइल हो गई है,फिर भी आठ घंटे काम करता हूँ. अब कोई काम ऐसा नहीं करता जिसमें पैसे की चाह हो. मेरा सारा वक़्त इंटर नेट पर गुज़रता है जहाँ अपने ब्लॉग के मार्फ़त मैं अनजानों को इंसानियत की राहें दिखलाता हूँ, सच्चाई मेरी तहरीक है और झूट से मेरा बैर है.
झूट हर हालत में झूट है, चाहे वह मज़हबी अल्लाह बोल रहा हो या धर्मों का भगवन.
दुन्या ने तजुर्बात व हवादिस की शक्ल में ,
जो कुछ मुझे दिया है वह लौटा रहा हूँ मैं.
Sunday, September 4, 2011
सलोन के मुस्लिम गहरवार (15)
मफ्कूदुल खबर
शजरे में मफ्कूदुल खबर बुजुर्गों के कुछ नाम हैं जिनके तह्कीकी नतायज अख्ज़ करने के बाद नज़रिया क़ायम किया गया है.
१-गुलाम अली ? अब्दुर रहमान की औलादें ज़्यादः तर पकसरावाँ मे आबाद हुईं, सलोन में दो भाई अस्सू बजाज और इब्राहीम की नस्लें आबाद हैं. अब्दुर रहमान के पर दादा के भाई गुलाम अली मज़कूरा होते हैं. इससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह दो पुस्त पहले पकसरावाँ जाकर आबाद हुए.
२-भग्गू खान --- मौजूदः मज़हर खान और हकीम सिफात
३- जोर अवर खान --- मौजूदः रिश्तेदार - - - डा. इलियास और डा. शकील
४- अमीर बख्श - - - " "
५- फकीर बख्श - - - " "
६-अमीर बख्श " "
७-मुख़्तार अहमद " क़दीर अहमद
८-बुद्धु खान राय बरेली बसे
९- मुनव्वर खान - - - मौजूदः रिश्तेदार - - - अब्दुल खालिक
१०- अब्दुल सत्तर खान - - - मौजूदः रिश्तेदार - - - मंज़ूर अहमद
११अब्दुल रहमान खा - - - मौजूदः रिश्तेदार - - - "
नीचे अफराद जिनकी औलाद दुख्तरी हुईं.
मियां फीरोज़ खान व् मियाँ बेचू खान - - -मौजूदः रिश्तेदार - - - अफज़ल अहमद
मियां अब्दुल शकूर खान- - - मौजूदः रिश्तेदार - - - "
छिद्दू खान - - - मौजूदः रिश्तेदार - - - अफज़ल अहमद फज़ल अहमद जौजे इकरामुन बीबी (बाज़ार फज़ल गंज) इन्हीं के नाम पर हुई.
करीम खान. शकूर खान - - - भुट्टी दादी के चचा
मियां बिक्कू खान - - -मौजूदः रिश्तेदार - - - अतीक अहमद
आबिद अली हवालदार व् नज्जू खान मौजूदः रिश्तेदार - - - शमशाद अली
खुदा बख्श, अकबर खान बशारत खान, सहकन खान ,मुहम्मद शफी, ख्वाजा बख्श वगैरह लावालाद है या कोई औलादे दुख्तरी है ?
रमजान अहमद - - - मौजूदः रिश्तेदार - - - (मुश्ताक अहमद उर्फ़ नन्हे) . इन्हीं की बेटी - - -
रमजान अहमद - - - मौजूदः रिश्तेदार - - - (मुश्ताक अहमद उर्फ़ नन्हे) . इन्हीं की बेटी - - -
"एक थीं भुट्टी दादी".
सलोन के मुस्लिम गहरवार (14)
माज़ी करीब की कुछ गहरवार शख्सियतें :
बीसवीं सदी के आगे और पीछे गहरवारों में कुछ नामदार हुए हैं जिनका ज़िक्र पेश है - - -
अंग्रेजों द्वारा बनाए गए सलोन के ६ नंबरदार हुवा करते थे. . .
१-नंबरदार असग़र खान ---जिनकी नस्लें चौधरी नियाज़ अहमद उर्फ़ अच्छन मियाँ की औलादें हैं.
२-नंबरदार बासित खान ---जिनके बेटे माजिद खान लावल्द हुए.
३-नंबरदार रशीद खान --- लावलद हुए. सौतेले भाई मजहर खान की औलादें मुंबई में रहती हैं. ४-अलीम खान --- लावलद गुज़रे, लड़की क़दीरून बीबी थीं.
५- नंबरदार सत्तार बख्श खान --- लावलद हुए, नवासे अब्दुल बारी मुखिया हुए जिनकी नस्लें नब्बन छब्बन और मेरे अज़ीज़ दोस्त रज़ी हैं.
६- अरशद अली खान ---इनका खानदान खूब फला फूला. नामी हकीम सिफ़ात साहब और उनके बेटे डाक्टर निहाल और मेरा प्यारा दोस्त अयाज़ इनकी नस्लों में मौजूद हैं.
असगर खान
इन नम्बरदारों में असगर खान अपनी ताक़त के लिए मशहूर थे. उनके कई क़िस्से हमारे बचपन में सुने जाते थे. . .
अपने मजदूर को दो किलो मीटर दूर गाँव से आवाज़ लगा कर बुलाते.
सुदीन के पुरवा से बबूल का पेड उखाड़ कर रातो रात अपने घर तक घसीट ले, इस तकरार के बाद कि इससे गाड़ी की पहिया कौन बनाएगा ? असगर मियाँ या किसान.
इसी पूर्वे से किसान से कुछ कर्बी मांगी, उसने कहा मियाँ ले जाइए जितना ल़े सकें. दो बीघे की कर्बी नहन में बाँधी और सर पर लाद कर घर ले आए.
७- रौशन खान --- राजा मियाँ की तीन औलादों में एक थे शहाब खान, शहाब खानी खूब फले फूले मगर कुछ ऐसा हुवा कि यह पेड़ सूख गया . रौशन खान इसके आखिरी चास्म चिराग रहे. रियासत का कुछ हिस्सा यह बचाए हुए थे और मॉल गुज़री पालकी से मजदूरों के साथ वसूलने जाते. इन्होने सलोन में पहला पक्का मकान लखोवरी ईंटों का बनवाया जो उस ज़माने के हिसाब से महेल कहा जाता था. यह भी लावालाद हुए एक लावारिस बच्चे को औलाद बनाया जोकि उनको किसी गाँव में सफ़र के दौरान मिला था. इनकी बेगम उस बच्चे के लिए बाकायदा सोवर बैठीं और बड़े धूम धाम के साथ उसका रस्मो-रिवाज हुवा. नाम रखा गज़न्फर खान, गोया शेर खान . गज़न्फर खान की औलादों में मुंशी नजीर का खानदान है.
८- मोलवी हामिद अली खान ---सबसे पहले मैं मोलवी साहब के वालिद मोहतरम का शुक्र गुज़ार हूँ कि उन्हों ने अपनी औलाद को अच्छी तालीम और तरबियत दी.
आप बड़े अलिम थे जिनका मुकाम निज़ाम हैदराबाद के दरबार में अव्वल दर्जे पर था जहाँ हिदोस्तान के जाने माने जोश मलिहादी जैसी हस्ती हुवा करती थी. मोलवी हामिद अली खान को दरबार में खास छूट थी कि वह पान खा सकते थे. मेरी नानी बतलाती थीं कि हामिद उनको सताने के लिए दहेरयत की बात करता और डाँटा जाता.
वह फारसी के आलिम थे. शाह नईम अता शाह और मेरे नाना के दोस्तों में थे. एक बार उन्हों ने चालीस ईरानी मुश्तःदों को दरबार में कायल करके हराया था.
आप हैराबाद गए वहीँ दूसरी शादी कर ली और वहीँ के हो गए. उनकी अवलादों में महमूद पटवारी और मुहम्मद सलोन में रहते हैं.
९-चौधरी इकबाल खान ---- नामवर शख्सियत थे भले ही उनके नफ़ी कारनामे थे. रिआया को नीम के पेड़ में बांध कर पिटाई करते. आज की नई बाज़ार उनकी ही विरासत थी जिसे बनियों के खाते में उधारी में चुका दिया. पाकिस्तान जाकर अपना अंजाम कायदे से भुगता.
१०- बुन्याद अली खान ---आप बरतानवी फ़ौज में हवालदार थे. अपनी मुलाज़मत में कई गैर मुल्की दौरे किए. टर्की गए तो अता तुर्क कमाल पाशा से रूबरू हुए और उन से मुसाफ़ा करने का शरफ़ हासिल किया. जापान से छिड़ी मुत्तःदा फ़ौज की तरफ से जंग लड़ी. पुर वकार शख्सियत थे. पढने लिखने का जौक था. मुझे उनसे काफी मालूमात हुई.
११- अहमद शाह --- नाम था अहमद खान. कलंदर तबअ ज़ात थी. तालीम याफ्ता थे. पांव पैदल ही हज के लिए निकल गए, रास्ते में किसी मुल्क में कानून शिकनी की, गिरफ्तार होकर हाज़िर अदालत किए गए. दर असल उनके पास अफीम थी, उन्होंने कहा यह मेरी गिज़ा है, इससे हमें महरूम नहीं किया जा सकता. जज ने उनके सामने एक पाव अफीम का गोला रक्खा और कहा, अपनी गिज़ा को खा कर दिखलाओ. अहमद शाह सारी अफीम चट कर गए. दूसरे दिन उन्हें भला चंगा देख कर माफ़ कर दिया और मआजरत ख्वाह हुवा. गैर शादी शुदा थे, मफ्कूदुल खबार हुए. मौजूदा खानदान मुंशी आफाक़ का है.
१२- शमीम अहमद खान --- आज़ादी के बाद सलोन के पहले गहरवार प्रधान हुए. टाउन एरिया होने के बाद पहले चेयर मैन हुए, महिला शीट हो जाने पर भी सलोन की गद्दी पर कायम रहे. खानदानी तफरका के बाईस हार का मुंह देखना पड़ा. बहुत कुछ सलोन के लिए कर सकते थे मगर उनके इक्तेदार तक सलोन की किस्मत नहीं बदल पाई.
१३- मुंशी आफाक --- हमारे उस्ताद रहे. अच्छे ताजिर बन कर गहरवारों में उभरे थे, ईमान की कमजोरी ने उन्हें पामाल कर दिया. एक स्कूल "सलोन जूनियर हाई स्कूल'' खोला. मैंने क ख ग का अक्षर ज्ञान दस साल की उम्र में वहीँ से पाया. तीन साल में स्कूल भी बंद हो गया.
बला के ज़हीन थे. मेरी याददाश्त के तल्ख़ और मीठे लम्हे उनसे वाबिस्ता है.
१४- डाक्टर इल्यास --- गहर्वारों में पहले डाक्टर है जिन्हों ने अपने लायक बेटे मुफज्ज़ल को सलोन का पल्ला M. B . B . S. डाक्टर बनाया.
१५-चौधरी नसीम अहमद - - - गहरवारों में पहले सपूत हैं जो L L B करके कामयाबी हासिल की और बेटे को M M B S कराया. राय बरेली में आबाद हुए. कुछ दिनों के लिए राजीव गांघी के करीब रहे.
इन नम्बरदारों में असगर खान अपनी ताक़त के लिए मशहूर थे. उनके कई क़िस्से हमारे बचपन में सुने जाते थे. . .
अपने मजदूर को दो किलो मीटर दूर गाँव से आवाज़ लगा कर बुलाते.
सुदीन के पुरवा से बबूल का पेड उखाड़ कर रातो रात अपने घर तक घसीट ले, इस तकरार के बाद कि इससे गाड़ी की पहिया कौन बनाएगा ? असगर मियाँ या किसान.
इसी पूर्वे से किसान से कुछ कर्बी मांगी, उसने कहा मियाँ ले जाइए जितना ल़े सकें. दो बीघे की कर्बी नहन में बाँधी और सर पर लाद कर घर ले आए.
७- रौशन खान --- राजा मियाँ की तीन औलादों में एक थे शहाब खान, शहाब खानी खूब फले फूले मगर कुछ ऐसा हुवा कि यह पेड़ सूख गया . रौशन खान इसके आखिरी चास्म चिराग रहे. रियासत का कुछ हिस्सा यह बचाए हुए थे और मॉल गुज़री पालकी से मजदूरों के साथ वसूलने जाते. इन्होने सलोन में पहला पक्का मकान लखोवरी ईंटों का बनवाया जो उस ज़माने के हिसाब से महेल कहा जाता था. यह भी लावालाद हुए एक लावारिस बच्चे को औलाद बनाया जोकि उनको किसी गाँव में सफ़र के दौरान मिला था. इनकी बेगम उस बच्चे के लिए बाकायदा सोवर बैठीं और बड़े धूम धाम के साथ उसका रस्मो-रिवाज हुवा. नाम रखा गज़न्फर खान, गोया शेर खान . गज़न्फर खान की औलादों में मुंशी नजीर का खानदान है.
८- मोलवी हामिद अली खान ---सबसे पहले मैं मोलवी साहब के वालिद मोहतरम का शुक्र गुज़ार हूँ कि उन्हों ने अपनी औलाद को अच्छी तालीम और तरबियत दी.
आप बड़े अलिम थे जिनका मुकाम निज़ाम हैदराबाद के दरबार में अव्वल दर्जे पर था जहाँ हिदोस्तान के जाने माने जोश मलिहादी जैसी हस्ती हुवा करती थी. मोलवी हामिद अली खान को दरबार में खास छूट थी कि वह पान खा सकते थे. मेरी नानी बतलाती थीं कि हामिद उनको सताने के लिए दहेरयत की बात करता और डाँटा जाता.
वह फारसी के आलिम थे. शाह नईम अता शाह और मेरे नाना के दोस्तों में थे. एक बार उन्हों ने चालीस ईरानी मुश्तःदों को दरबार में कायल करके हराया था.
आप हैराबाद गए वहीँ दूसरी शादी कर ली और वहीँ के हो गए. उनकी अवलादों में महमूद पटवारी और मुहम्मद सलोन में रहते हैं.
९-चौधरी इकबाल खान ---- नामवर शख्सियत थे भले ही उनके नफ़ी कारनामे थे. रिआया को नीम के पेड़ में बांध कर पिटाई करते. आज की नई बाज़ार उनकी ही विरासत थी जिसे बनियों के खाते में उधारी में चुका दिया. पाकिस्तान जाकर अपना अंजाम कायदे से भुगता.
१०- बुन्याद अली खान ---आप बरतानवी फ़ौज में हवालदार थे. अपनी मुलाज़मत में कई गैर मुल्की दौरे किए. टर्की गए तो अता तुर्क कमाल पाशा से रूबरू हुए और उन से मुसाफ़ा करने का शरफ़ हासिल किया. जापान से छिड़ी मुत्तःदा फ़ौज की तरफ से जंग लड़ी. पुर वकार शख्सियत थे. पढने लिखने का जौक था. मुझे उनसे काफी मालूमात हुई.
११- अहमद शाह --- नाम था अहमद खान. कलंदर तबअ ज़ात थी. तालीम याफ्ता थे. पांव पैदल ही हज के लिए निकल गए, रास्ते में किसी मुल्क में कानून शिकनी की, गिरफ्तार होकर हाज़िर अदालत किए गए. दर असल उनके पास अफीम थी, उन्होंने कहा यह मेरी गिज़ा है, इससे हमें महरूम नहीं किया जा सकता. जज ने उनके सामने एक पाव अफीम का गोला रक्खा और कहा, अपनी गिज़ा को खा कर दिखलाओ. अहमद शाह सारी अफीम चट कर गए. दूसरे दिन उन्हें भला चंगा देख कर माफ़ कर दिया और मआजरत ख्वाह हुवा. गैर शादी शुदा थे, मफ्कूदुल खबार हुए. मौजूदा खानदान मुंशी आफाक़ का है.
१२- शमीम अहमद खान --- आज़ादी के बाद सलोन के पहले गहरवार प्रधान हुए. टाउन एरिया होने के बाद पहले चेयर मैन हुए, महिला शीट हो जाने पर भी सलोन की गद्दी पर कायम रहे. खानदानी तफरका के बाईस हार का मुंह देखना पड़ा. बहुत कुछ सलोन के लिए कर सकते थे मगर उनके इक्तेदार तक सलोन की किस्मत नहीं बदल पाई.
१३- मुंशी आफाक --- हमारे उस्ताद रहे. अच्छे ताजिर बन कर गहरवारों में उभरे थे, ईमान की कमजोरी ने उन्हें पामाल कर दिया. एक स्कूल "सलोन जूनियर हाई स्कूल'' खोला. मैंने क ख ग का अक्षर ज्ञान दस साल की उम्र में वहीँ से पाया. तीन साल में स्कूल भी बंद हो गया.
बला के ज़हीन थे. मेरी याददाश्त के तल्ख़ और मीठे लम्हे उनसे वाबिस्ता है.
१४- डाक्टर इल्यास --- गहर्वारों में पहले डाक्टर है जिन्हों ने अपने लायक बेटे मुफज्ज़ल को सलोन का पल्ला M. B . B . S. डाक्टर बनाया.
१५-चौधरी नसीम अहमद - - - गहरवारों में पहले सपूत हैं जो L L B करके कामयाबी हासिल की और बेटे को M M B S कराया. राय बरेली में आबाद हुए. कुछ दिनों के लिए राजीव गांघी के करीब रहे.
सलोन के मुस्लिम गहरवार 13
सलोन के लैंड माक्र्स :-
२- मूरिसे आला की कब्र से मुल्हिक गुम नाम मसिजद ३-सल्ला बाबा की मसिजद ४-दिलवर शाह की मसिजद ५-कच्ची मसिजद ६- कोतवाली की मसिजद ७-थवाहियों की मसिजद ८- खानकाह की मसिजद ९-खातून की मसिजद (खानकाह की मसिज्द के पास ) १०- शाहजी की मसिजद (गुरही) ११-शेखों की मसिजद १२- उस्मान खान की मसिजद १३सरायं की मसिजद
१४- सुब्बा रंगरेज़ की मसिजद १५- मिल्कियों की मसिजद १६- शियों की मसिजद १७- कैथाने की मसिजद १८-पैगम्बर पुर की मसिजद १९-नई बाज़ार की मसिजद २०- तवककली की मसिजद २१-चक्ले की मसिजद २२- मसिजद ज़मीं दराऊ २३- मुनव्वर गंज की मसिजद
२४- हाजी हुसैन की मसिजद २५- किंगिर्यों की मसिजद
इनके आलावा कुछ मखसूस मुक़ाम :-
*रौजः ए मुक़द्दस खानदान ए करीमी * खानकाह करीमी *कर्बला *ईदगाह *मजार सय्यद शकूर ओ सय्यद गफूर * रौजः कब्रिस्तान * इमाम बाड़ा मुत्तसिल कचेहरी *मजार शहीद मर्द बाबा. *मरहला जो अपने ज़माने में १०० फीट ऊंचा था इनके अलावः चार मंदिरें और एक गुरु द्वारा जो हाल में ही वजूद में आए. किसी ज़माने में सलोन को तीन हिस्से में जाना जाता था :
सलोन आयमा : पूरब जानिब का हिस्सा
सलोन खालसा : पश्चिम जानिब का हिस्सा (चौधराना)
करीम गंज बीच का हिस्सा
*सलोन का बिरादराना
सलोन में आबाद बिरादरी आपस में एक दूसरे की ज़रुरत पूरा करती रहीं.उनकी पहचान मंदार्जा जेल है :
१-मुस्लिम गहरवार २- मुस्लिम बैस ३- मुस्लिम कायस्थ ४-शेख ५- सय्यद ६-पठान 7 - मिल्की (शिया) 8-जाफ़री (करीमी) ९ - मेवाती १० - जुलाहे ११ - बेहने १२ -नाई १३ - कुंजड़े १४ -कसाई १५ - चिक्वे १६ - दर्जी १७ -थवही १८ - रंगरेज़ १९- मिरासी २० -हलवाई २१-घोसी २२- घसयारा
२३-चूड़ीहार २४-किंगिरिया २५- डफली २६-फ़कीर २७- मेहतर २८- रंडी भडुए.
२९-रस्तोगी ३०- सिख ३१- बनियाँ ३२-तेली ३३- हलवाई ३४- कलवार ३५- धरकार ३६- पटहार ३७- सोनार ३८- भुन्ज्वा ३९- कुम्हार ४०- लोहार ४१- बढई ४२-धोबी ४३- अहीर ४४- गडरिया ४५-मुराई ४६ -चमार ४७- पासी ४८-भड्डरी ४९-बरहमन ५०- तंबोली ५१-भंगी.
गंज शहीदां
दोनों लाशों की सूरत ए वकुअ यूँ थी कि सर (नदारत)उनका मशरिक जानिब था और पैर मगरिब जानिब. उनकी कब्रें इस्लामी शरीअत के मुताबिक खोदी गईं और लाशें उसमें दफनाई गईं, उसके बाद कब्रें खुद बखुद शुमाल जुनूब से मशरिक और मगरिब जानिब हो गईं. इन क़ब्रों को आज भी देखा जा सकता है. मगर रवायत बहर हाल रवायत होती हैं, नामों और पेशे पर भरोसा किया जा सकता है.
यहाँ औरते मन्नत मानने आती है, मुराद पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ती हैं. बहुत पहले वक्तों में यहाँ लोग आकर रिश्ते तय किया करते और शादी हो जाने पर नान्द मुर्ग़, पराठे बिरयानी और शोरबेदार चीजों पर फातेहा करते. हिन्दू बिरादरी की कुछ कौमें दूल्हे के डोले को यहाँ लेकर आते और आशीर्वाद लेते. तालीम आने के बाद अब बातें इतिहास हो चुकी है. मुझे अच्छी तरह होश है की शाह नईम अता शाह यहाँ अपने बुजुर्गों के उर्स के बाद गागर भरने आते और लोग उस पानी को प्रसाद की तरह ग्रहण करते.
Saturday, September 3, 2011
सलोन के मुस्लिम गहरवार (12)
सलोन
सलोन एक क़दीमी बस्ती है, इतनी क़दीम कि इसे आसार कदीमा के हवाले करके इसके इतिहास तक पहुँचा जा सकता है. सलोन को सालिवाहन नाम के शाषक ने आबाद किया था, इसका नाम उसी के नाम पर सालिवाहन नगर हुवा. बस्ती पर कुदरती आपदा आई, यह तो यकीनी है, मगर कब आई, उसका रद्दे अमल क्या रहा, इसके बारे में कोई इतिहास नहीं मिलता. सलोन कि ऊंची नीची ज़मीन कहती है कि इसकी यह बहुत प्राचीन भौगोलिक रचना नहीं है, बलकि यह भूमि का एक ऐतिहासक परिवर्तन है. खुदाई करने पर अकसर आसार मिलते हैं. सलोन अपनी वीरानी को बहुत दिनों तक झेलता रहा, फिर मुस्लिम काल इस सर ज़मीन पर दोबारा आबाद हुवा. सय्यद शकूर और सय्यद ग़फूर की मजारें जो गंज शहीदां कही जाती हैं, आबादी से हट कर किस रिआयत से उत्तर में वाकेअ है, कयास है कि यहाँ पर राजा सालिवाहन का कोई स्मारक या पूजा स्थल रहा होगा जिसे मुस्लिम काल में तब्दील कर दिया गया होगा. हिदुस्तान में ऐसी हजारो घटनाएँ घटीं,
सलोन का भव्य रौज़ा किसी सौदागर ने बनया था जो सय्यद पीर मुहम्मद या उनके वंशज करीम अता शाह का मुरीद था. उसने अपनी तिजारत की सारी दौलत इसी रौजः पर सर्फ़ कर दिया था. उसकी कब्र भी १९६० तक मुजाविर के खेत में वाकेअ थी.
सय्यद पीर मुहम्मद शाह कड़ा मानिकपुर आकर सलोन आबाद हुए थे. किंदँतियाँ मशहूर है कि उनके जप तप से काबिज़ देव ने रौजः की ज़मीन का त्याग किया. वह मकबूल हुए तो अतराफ़ के मुस्लिम तबके आकर सलोन में आबाद हुए. पीर मुहम्मद शाह का सिलसिला कुछ इस तरह है: --
२- मुहम्मद अशरफ़ शाह ३- मुहम्मद पनाह शाह ४- मुहम्मद करीम अता शाह ( मुहल्लाह करीम गंज इनके नाम से है.)
५- शाह मुहम्मद पनाह अता ६- शाह हुसैन अता शाह ७- शाह मेंहदी अता शाह ८- शाह नईम अता शाह.(ला वलद)
रौजः में पहले सात पीरों की कब्रें हैं.
(१९६०)आज से पचास साल पहले की सलोन की तारीखी और जुगाराफियाई हैसियत दर्ज है जो आने वाले पचास साल के बाद नई नस्लों के लिए दिल चस्प इतिहास होगा.
*सलोन के बटे हुए मोहल्ले
१-कोतवाली २- ठाकुर द्वारा ३- चौधराना ४- ऊंचा ५-अहिरन टोला ६- ज़मीं दराऊ ७- जुलाहन टोला ८-चुडिह़ारन टोला ९-चमर टुलिया १०- खरव्वान (भंगियों का ठिकाना) ११-नरिया १२- गुराहिया १३- शाह जी का पुरवा १४- धुबियन टोला १५-सय्यद गंज १६- चमर टोलिया (गुरही)
१७-निभाडा १८-किंगिरयन टोला १९-पठन टुलिया २०-मिलकियाना २१-नेवती मोहल्ला २२-हुसैन गंज २३- किला २४- चकला २५- मुनव्वर गंज २६- हज़रात गंज २७-फज़ल गंज २८-पैगम्बर पुर २९-कैथाना ३० - सरायं ३१-करीम गंज
सलोन के मुस्लिम गहरवार (11)
अपने जैसे
ज़ेरे दामन विन्ध्याचल यानी इलाहबाद, वाराणसी और में हिदू गहरवारों के साथ साथ मुस्लिम गहरवार शाने बशाने बकस्रत पाए जाते हैं सलोन की तरह ही अपने हिन्दू पूर्वजों का इतिहास और अपने मूल पुरुष का नाम उनको भी याद है.
नवल गढ़ (बनारस) में मुस्लिम गहरवार बकसरत आबाद है. यह लोग वक़्त के साथ तालीम, तिजारत और ज़राअत में किसी से पीछे नहीं. खुद को राजा जय चंद की पांचवी औलाद राजा सकत सिंह से जोड़ते हुए बतलाते हैं कि उनके मूरिसे आला सकत सिंह , चरागे हिंद मखदूम शाह के हाथों पर बैत करके मुसलमान हुए थे, जिनकी मज़ार जाफराबाद में है. उनका नाम हो गया सकत सिंह से, सकत खान. कई पुश्तों तक रिआया उनके हाथ रही. १७५७ में राजा दायम खान को राजा बनारस ने शिकस्त देकर रियासत पर क़ब्ज़ा कर लिया. उनके बाद कोई फ़र्द इकतेदार हासिल न के सका. राजा सकत खान की नस्लें जिला बनारस की नस्लें नई और पुराणी चकिया, मंझौली, भडसल, भूसी, सरबत, और किराय गाँव वगैरा में बकसरत आबाद हैं.
पुरानी चकिया का हमारा दौरा बहुत ही खुश गवार रहा. जनाब अनवार हुसैन और डाक्टर अनीसुल हक़ गहरवारों ने हमारी मेज़ बनी की रात के खाने पर हमारे साथ खानदान के मुअत्बर लोगों को बुलाया, तवील गुफ्तुगू हुई, लोगों ने हमारी मालूमात में भरपूर अज़ाफा किया. यह खानदान राजा सकत खान की नस्लें है.
चितावन पुर
अजीब ओ ग़रीब बाशिंदे, मुस्लिम गहरवारो के, जिन्हें देखने और सुनने का मौक़ा मिला. आज भी वह सब मुजस्सम हिन्दू हैं, बस उनके नाम मुस्लिम हैं. खानदानी रक़ाबत उनका धर्म और ईमान है और उनकी आन बान है. वह लोग आज भी वहशत को जी रहे हैं. हर वक़्त आमादा ए खून ओ कुश्त रहते हैं.
हमारा उनके गाँव में दाखिला उनको अच्छा न लगा. अगर मैं उनके प्रधान के नाम का हवाला न देता तो शायद अपनी इज्ज़त और सर न बचा पाता. प्रधान मौजूद न थे, उन्हों ने मुझे अपने छप्पर में बिठाया और खातिर भी की, पत्तल में शकर देकर जिसे हमें फांकना पड़ा.
मैंने अपनी तहरीक का मुद्दुआ बयां किया और उनसे अपने सवालों के जवाब देने की गुज़ारिश की. उन्हों ने बतलाया कि वह राजा घाटम देव के वंसज हैं. वाक़ेआ है कि राजा की जवान साल बेटी का इंतेकाल हो गया था, उसकी लाश चिता पर रखी गई और उसको आग दी गई कि आग पाकर चिता भरभरा कर ढह गई, कफन भस्म हो चुका था और बेटी का शरीर नंगा हो गया था. घाटम देव को इसका सदमा लगा, उन्हों ने बेटी की लाश को मुस्लिम तरीके से दफ़न कराया और ? जाकर इस्लाम क़ुबूल किया.
घाटम देव के दो बेटे सलेम खां और दरिया खां में बैर हो गया था जिसे दोनों खानदान अब तक बाक़ायदा निभा रहे हैं. साल छे महीने में दोनों धडों में खूनी जंग होती है. पुलिस की मजाल नहीं कि सरकश गाँव में घुस सके. दोनों एक दूसरे के हाथ का छुवा पानी तक नहीं पीते.
हम जिस छप्पर में बैठे थे उसमें हमने देखा कि तलवार, फरसे और दीगर हथियार खुसे हुए थे, जिन्हें देख कर हम लोगों का खून सूख रहा था. एक ने हमसे पूछा कि हम लोग हिन्दू धर्म में चले जाना चाहते हैं, आप लोगों की क्या राय है?
हमने बस इतना ही कहा आप लोग अपना फैसला बेहतर कर सकते हैं.
गाँव में बे मीनार और बे गुम्बद की एक एक मस्जिद है जो मदरसे का भी काम करती है. उसमें बच्चों को तालीम के नाम पर एक मोलवी कुरआन का रवायती दर्स देता है और जुमा जुमा उन लड़ाकुओं को नमाज़ भी पढ़ाता है. गाँव में परदे का यह आलम था कि कोई बच्ची जाद भी हमें नज़र न आई..
गहेरवारों का इतिहास और राजा देवदत्त उर्फ़ राजा मियाँ, मेरी महदूद और मजबूर हालात की काविश है जो नामुकम्मल और अधूरी है. मुझे उम्मीद है कि आइन्दा आने वाली नस्लों में कोई लायक़ सपूत इसे मज़ीद तहक़ीक़ के बाद मुकम्मल करेगा.
जुनैद
**********************
सलोन के मुस्लिम गहरवार (10)
गहरवार
*किसी ज़माने में कोहे विन्ध्याचल के दामन में गहरे जंगल हुवा करते थे, इस लिए यहाँ बसने वाले सूर्य वंशी और चन्द्र वंशी कौमें गहरवार कही जाती थीं. यानी गहरे जंगल के बशिदे.
*दूसरी वजेह गहरवार कहलाने की, राजा राम चन्द्र जी के नस्लों में नामवर राजा, राजा किशन हुए, जिनके बेटे गुहरदीप हुए, जिनकी औलादों ने चारो तरफ बिखर कर राज स्थापित किए. उनकी औलादे गहरवार कहलाईं.गहर दीप की नस्लों में से कुछ कबीले ने जंगल को ही अपना निवास बनाया जिन्हें आज खाना बदोशों की शक्ल में देखा जा सकता है. वह खुद को गहरवार कहते हैं. इनका इतिहास सीना बसीना आज तक जिंदा है. इनकी गाथा से तसव्वुर कायम किया जा सकता है कि इनके पूर्वजों ने मुहज्ज़ब दुन्या के आए दिन के जंगी खून खराबे से तंग आकर जंगल में रहना पसंद किया. कहीं यह हिन्दू मुआशरे से मुतास्सिर हैं तो कहीं मुस्लिम मुआशरे से. इन्हीं के मुताबिक इनके नाम हुवा करते हैं.
*तीसरी वजह गहरवार के नाम क़ी तारीख वोस्ता से मालूम होता है कि राजा जय चन्द और राजा मानिक चन्द के पांचवें पितामह राजा चन्द्र देव गाहड़वाल को, जिन्हें राजा वन्नर भी कहा जाता था,जिनके नाम से काशी का नाम वाराणसी पड़ा जो बिगड़ कर बनारस हुवा, फिर सुधर के वाराणसी हुवा. गाहड़वाल बदलते बदलते गहरवार हो गया.
अँगरेज़ मुवर्रिख ग्रीस लिखता है - - -
"पहले काशी राज गहरवारों के हुकूमत में शामिल था, गोकि वहाँ के राजा आज बरहमन हैं, चूंकि गहरवारों ने हमेशा बरह्मनो की कद्र की है इस लिए हो सकता है गहरवारों ने दान या सम्मान में बरह्मनो को दे दिया हो. आज भी कहीं कहीं गहरवार कशी नरेश कहलाते हैं."
*कौम बुंदेला भी गहरवारों से निकली हुई है. राजा गहरदीप की दसवीं पुस्त राजा वीर भद्र हुए, उनकी दो रानियाँ थीं. पहली से कई औलादें थी और दूसरी से सिर्फ़ एक बेटा हुआ, "पंचम देव गहरवार".
*कौम बुंदेला भी गहरवारों से निकली हुई है. राजा गहरदीप की दसवीं पुस्त राजा वीर भद्र हुए, उनकी दो रानियाँ थीं. पहली से कई औलादें थी और दूसरी से सिर्फ़ एक बेटा हुआ, "पंचम देव गहरवार".
रवायत है कि पंचम देव अपने सौतेले भाइयों से तंग आकर बगरज़ खुद कुशी ज़ेरे दामन कोह विन्ध्याचल, 'वासनी देवी' की मंदिर गए और देवी के आगे अपनी गर्दन पर तलवार मारी. गर्दन तो न कटी मगर खून की कुछ बूँदें देवी को अर्पित हो गईं.
कहते हैं देवी नमूदार हुई और कहा - - -
" जा तेरी क़ुरबानी कुबूल हुई, तू आगे चल कर एक बड़ा राजा बनेगा. तूने मुझे अपनी खून की बूंदें दी है, इस लिए तेरी संताने बुंदेला कहलाएंगी.
सलोन के मुस्लिम गहरवार (9)
गहरवारों की मर्यादा
*दूसरा नाक़ाबिल ए फ़रामोश वाक़ेया गहेर्वारों में, रानियों की मान और मर्यादा का है - - -
कि राजा साहब ? की छोटी बेटी की बारात आई थी, कुंवर जी और राज कुमारी की शादी हो चुकी थी. शादी के बाद की रस्में हो रही थीं. कुंवर जी ने बड़ी साली को देखा तो उनके हुस्न के ऐसे दीवाने हुए कि उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहने लगे - - -
"आपके हाथ बहुत खूब सूरत हैं."
" अच्छा! अब हाथ छोडिए, मैं आप के लिए आपका मन पसंद तोहफा लेकर आती हूँ "
कि राजा साहब ? की छोटी बेटी की बारात आई थी, कुंवर जी और राज कुमारी की शादी हो चुकी थी. शादी के बाद की रस्में हो रही थीं. कुंवर जी ने बड़ी साली को देखा तो उनके हुस्न के ऐसे दीवाने हुए कि उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहने लगे - - -
"आपके हाथ बहुत खूब सूरत हैं."
" अच्छा! अब हाथ छोडिए, मैं आप के लिए आपका मन पसंद तोहफा लेकर आती हूँ "
कहती हुई रानी अन्दर के कक्ष में गई, जल्लाद को बुलवा कर अपने उस हाथ को कटवा कर थाली में रखवाया और दूसरे हाथ में थाली लेकर कुंवर जी के पास आई और कहा ;
" लीजिए कुंवरजी आपको मेरा हाथ पसंद आया था, आप को अर्पित है, वैसे भी अब यह मेरे किसी काम का न रहा."
बात आग की तरह फैली, बड़ी बेटी के राज कुमार तक पहुंची,
राजपूत ने तलवार मियान से निकल लिया और अन्दर घुस कर अपने साढू का सर कलम कर दिया. शादी का घर मातम में बदल गया. यहीं तक बात नहीं गई, कुंवर जी की चिता पर नव ब्याहता कुमारी बहेन ने कूद कर अपने पति के साथ भस्म हो गई.
ऐसे आन बान के हुवा करते थे ठाकुर और ठाकुरानियों की मान और मर्यादा .
रानी पद्मिनी की ऐतिहासिक कहानी को कौन नहीं जनता.
इसके बाद तारीख साजों की कलम गहेरवारों की तवारीख को हज़रात ए नूह तक ले जाती है और इतिहास कार इसे चन्द्र वंशी राजा, राजा जनक तक ले जाते हैं जिसे इनकी क़लमी उड़ान ही कहा जा सकता है.
" लीजिए कुंवरजी आपको मेरा हाथ पसंद आया था, आप को अर्पित है, वैसे भी अब यह मेरे किसी काम का न रहा."
बात आग की तरह फैली, बड़ी बेटी के राज कुमार तक पहुंची,
राजपूत ने तलवार मियान से निकल लिया और अन्दर घुस कर अपने साढू का सर कलम कर दिया. शादी का घर मातम में बदल गया. यहीं तक बात नहीं गई, कुंवर जी की चिता पर नव ब्याहता कुमारी बहेन ने कूद कर अपने पति के साथ भस्म हो गई.
ऐसे आन बान के हुवा करते थे ठाकुर और ठाकुरानियों की मान और मर्यादा .
रानी पद्मिनी की ऐतिहासिक कहानी को कौन नहीं जनता.
इसके बाद तारीख साजों की कलम गहेरवारों की तवारीख को हज़रात ए नूह तक ले जाती है और इतिहास कार इसे चन्द्र वंशी राजा, राजा जनक तक ले जाते हैं जिसे इनकी क़लमी उड़ान ही कहा जा सकता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)










